Sunday, October 23, 2016

अक्ल-दाढ़

अक्ल-दाढ़
ब्रजेश कानूनगो  
  
मन की तरह ही
खाली होता है शिशु का मुँह
   
कभी नहीं आते सारे दांत एक साथ
दिखाई देता है यदि एक-आध कोई जन्मजात
गिर जाता है वह भी
शैशव दांतों के पतन के साथ-साथ
स्थायी नहीं होता इनका जीवन

याद नहीं रह पाते वे मुलायम मोती  
माँ के दूध की मिठास की तरह
बिसर जाते हैं स्मृति से समय के साथ          

सही मायने में अवतरित होते हैं असली दांत
जमाने की हवा लगने के बाद

बत्तीसी खिलती है तो
आगे के आठ-दस मोहित करते हैं दुनिया को  
मुस्कराहट के पीछे छुपा दाढ़ों का घातक दस्ता
चबा जाने को तैयार बैठा रहता है हरदम
जुबान और मसूढ़ों के चक्रव्यूह में घिरकर
अच्छे-अच्छों को पिस जाने में देर नहीं लगती

सच्चाई तो यह है कि
तमाम हरकतों और नुक्सान के बाद
बड़ी मुश्किल से फूटती है अक्ल-दाढ़.

ब्रजेश कानूनगो 

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