Monday, December 16, 2019

कुछ गीतिकाएं


कुछ गीतिकाएं 

1
वक्त रुकता नहीं

जिंदगी के बोझ से
कसमसाता है
आदमी वह जो
दुःख में मुस्कुराता है।

पत्थरों से पट गया है
घर का आंगन
बागीचा एक हरा 
दिल में लहलहाता है।

कांटों से भरी हैं
ये अकड़ती झाड़ियाँ
फल रसीला चुपके से
पिलपिलाता है।

खार से है लबालब
सागर का चेहरा
मोती कोई भीतर से
चमचमाता है।

ठूंठ रह गया
जो पेड़ हरा था कभी
धूल धुसरित बीज
एक अंगड़ाता है।

मैं ठहाका लगाता
बिगड़े हालात पर
लूटकर जो भागे हैं
डर उन्हें सताता है।

कल मैं था तख्त पर
आज जो है यहां
वक्त रुकता नही
वह बहुत घबराता है।

ब्रजेश कानूनगो 
 

2
उधर सितार बजता है

कोई  है  जो
धड़कनों  को  सुनता है।
इधर सारंगी तो
उधर सितार बजता है।

जमा किया था जो 
दुश्मनों में बंट गया
घर  के आगे अब
अंधेरा घना रहता है।

लूटने आते हैं 
दौलत  हमारी  कुछ लोग
संदूक तो उन्ही की
खूंटी से बंधा रहता है।

दुःख के समंदर में
खार भी कम होता नहीं
दिल में मोहब्बत का मगर
नीर भरा रहता है।

सच गलत का फैसला
दुधारी पर आ टिका
संदेह का अदृश्य खंजर
सीने पे तना रहता है।

खत्म होंगे सारे मसले
मुश्किलें कम हो जाएंगी ?
हाकिम तो अक्सर
चकाचौंध में फ़ना रहता है।

3
एक जंगल  मर गया

व्यंजना है बेअसर
कविता से कागज भर गया।
नष्ट हो गए पेड़  सारे
एक जंगल  मर गया।

पीछे  पड़े जो  कुछ  लफंगे
बुद्धि ओ उस्ताद के
द्रोही कलम घोषित हुई,
विचार निहत्था झर गया।

बांसुरी के वक्त पर 
शंख का उन्माद बेवजह  
आलाप गुम जाने कहाँ,
चीखों से गुम्बद भर गया।  

महामना के पदों पर
रास्ते बनते नहीं 
तोड़ निर्बल का घरौंदा,
राजपथ ये बन गया।

फाड़कर तारीख़ के पन्ने,
भूगोल को बदल रहे
तंत्र में ऐसा मन्त्र फूंका,
विश्वास गण का ढह गया।

ब्रजेश कानूनगो 
 


4
मुस्कुराहटें लिखता हूँ

बाग़ से गुजरता हूँ।
मन में रंग भरता हूँ।

मौसमों के रूप न्यारे
मैं बहार चुनता हूँ।

बूंद थिरकती धूप में
इंद्रधनुष सा खिलता हूँ।

उंगलियाँ घायल हुईं
मैं सितार सुनता हूँ।

कल न जाने क्या घटे
आज ही मैं कहता हूँ।

बाल मन सा साफ़ कागज़
मुस्कुराहटें लिखता हूँ।


ब्रजेश कानूनगो 


5
नित नई हैं बेड़ियाँ

बोलियों का शोर भारी
रोज के बाजार में।
आत्मा भी बिक गई
इस भरे बाजार में।

देह सजती रही
गुड़ियों की दूकान पर
तैयार हैं संवेदना
बिकने को बाजार में।

वह बेचारा क्या कहे
जिसने खोया अपना घर
विस्थापित खुशियाँ हुईं,
लुट गया बाजार में।

बेबसी तो  देखिए
इस महा गणराज्य की
याचना के स्वर दबे,
जयकार बहुत बाजार में।

वह तो बस तारीख थी
जब से हम आजाद हैं
नित नई हैं बेड़ियाँ
बेधड़क बाजार में।

ब्रजेश कानूनगो


6
तो कोई बात बने

दिल गुलशन में चंपा फूले
तो कोई बात बने।
अंतरतम में एक दिया जले तो
कोई बात बने।

रोशनी उनकी
खस्ता अंधेरों तक आती नहीं
इधर थोड़ा दर्पण घुमाओ
तो कोई बात बने।

सात समंदर सातों धरती
बेशक नाप लिए हों
घर में आओ इस चूल्हे तक
तो कोई बात बने।

षटरस छप्पन पकवानों की
दावत खूब उड़ाई 
टिक्कड़ खाओ संग हमारे
तो कोई बात बने।

भेद न होता रक्त रक्त में
मजहब के आधार पर
हो विश्वास का रंग कौम में
तो कोई बात बने।

ब्रजेश कानूनगो

7
पत्तों का गिरना शोर हो गया

सन्नाटा अब
कौन हो गया।
चीख चीख कर
मौन हो गया।

सूरज आगे
धुंध का पर्दा
धूप का तेवर
गौण हो गया।

सरगम गुम है
शब्द भटकते
ढपली का स्वर
ढोल हो गया।

आवाजों पे
हाकिम का पहरा
पत्तों का गिरना
शोर हो गया।

रेखाओं का
गणित जो बिगड़ा
त्रिभुज बदलकर
गोल हो गया।

झूठ भरा
रजाई भीतर
मोहक कपड़ा
खोल हो गया।

दोस्त पड़ोसी
रिश्ता मीठा
क्यों कर कड़वा
घोल हो गया।

दुख के बादल
इस उपवन में
देख तुम्हे
मन मोर हो गया।

बाजार भरोसा
खूब सजा
गलत आपका
मोल हो गया।

ब्रजेश कानूनगो


8
ये मौसम

बड़ी गर्मी रही मौसम में
थोड़े दिन पहले।
बेहाल था पसीने से शहर
थोड़े दिन पहले।

ओढ़कर मखमली रजाई
निकल रहा सूरज
हौसला कम था हवाओं में
थोड़े दिन पहले।

सुर्खियों के तेवर
चढ़ने लगे अखबार में
रोशनाई खो गए थे
शब्द थोड़े दिन पहले।

स्वर शब्द थिरकते
देश के इस राग में
मुग्ध रहे इक ढोल पर
थोड़े दिन पहले।

बादशाहत का नशा भी
खूब चढ़ता है यहाँ
आज मैं हूँ तख्त पर
दूसरा थोड़े दिन पहले।

ब्रजेश कानूनगो

9
साया आफ़ताब हुआ है

पक्षी सारे चुप पेड़ों पर
जाने ऐसा क्या हुआ है।
कर्फ्यू सा सन्नाटा पसरा
कुछ ऐसा फरमान हुआ है।

महुए में ये शहद घोलकर
शरबत पिला रहे हैं
सच पर परदेदारी 
शायद कोई अरमान हुआ है।

सतरंगी मेला लगता था 
रंग बिरंगे फूलों का
खुद के ढोरपने से
उपवन ये बरबाद हुआ है।

पछताने से क्या होगा जब
लहू बह रहा पैरों से
जोश होश से कांटे सींचे
साया यों आफ़ताब हुआ है।

फिलवक्त पर पत्ते झरते
लोकतंत्र के पेड़ों से
इंकलाब के नारों से
गुलशन फिर आबाद हुआ है।

ब्रजेश कानूनगो


 

Tuesday, January 10, 2017

कोहरे में सुबह

कविता
कोहरे में सुबह
ब्रजेश कानूनगो

रैपर में लिपटी सुबह के भीतर
किलकारियाँ कैद हैं
किसी बच्चे का दूध छलक गया है तश्तरी में

दृश्य अब शुरू होने को है
लहराने लगा है संवेदनाओं का पर्दा  
चूड़ियों की खनक और   
गजरों की महक से भरने लगी है हवा    

सुबह का रैपर हटेगा
तो दिखाई देगी तश्तरी में छपी तस्वीर

पहाड़ियों के बीच से मुस्कुराने लगेगा सूरज
और तश्तरी के दूध को गटक जाएगा बच्चे की तरह

बबूल में उलझ जाएगा झोपडी से निकला धुआँ
गर्म रोटियों की खुशबू से लद जाएँगी डालियाँ
  
ठीक इसी वक्त
पक्षियों का एक समूह निकल जाएगा रोज की यात्रा पर.


ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर - 452018 
      


  




  

  

  

जायज नहीं जो

कविता
जायज नहीं जो 
ब्रजेश कानूनगो

पत्थरों की बस्ती बसाने के लिए
मत छीनों हमारे खेत का टुकड़ा  
सुर्ख फीते से धड़कनों को बांधना ठीक नहीं बिलकुल 

ये जो लहलहा रही है उम्मीद की हरियाली 
पसीनें से सिंचित होकर
शहद की तरह
मिठास से भर देती है हमारी दुनिया 
 
कर सको तो यह करो बेशक
कि आंसुओं को छीन लो
बुलडोजर के रास्ते पर दौड़ा दो
संवेदनाओं की नदी हमारे खेतों तक

बहुत सुन्दर लगते हैं
पहाड़ों की छाँव में 
पक्षियों की तरह गाते
पलाश के फूल    

तुलसी के गमले में
ठीक नहीं 
पैसों का पेड़ उगाना

ये गलत कहावत है कि
प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज होता है
और यह तो कतई नहीं है तुम्हारा प्रेम
जिसके लिए लड़ रहे हैं हम .


ब्रजेश कानूनगो   
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018 





  

अमर घर चल

कविता
अमर घर चल
ब्रजेश कानूनगो

अमर ! तुम घर क्यों नहीं आते  
पहली कक्षा की पाठ्य पुस्तक में
कितनी बार कहा गया था तुमसे 
कि चल अमर घर चल  

तुम चाहो तो अकबर को भी साथ लेते आओ  
मगर घर चले आओ अब 
प्रताप कब से इन्तजार कर रहा है 
कि तुम आओ तो कुछ काम शुरू करें

कोई तुमसे कुछ नहीं कहेगा
बाबूजी पिछले साल दमें में दम तोड़ चुके हैं
माँ की आँखों में अन्धेरा उतर आया है

जिसे तुमने कभी घर नहीं माना 
वह अब भी तुम्हारे इन्तजार में आँसू बहाता रहता है
डॉ अमरेंद्र कुमार
तुम्हारे लौटने के पहले ही  
स्टेट्स का क्लोन यहाँ तैयार कर लिया गया है

तुम खुश होंगे जानकर कि  
दुनियाभर का विश्वास अर्जित किया है हमने
तुम भी करो भरोसा अमर
कोई परेशानी नहीं होगी तुम्हे
यहीं आकर बनाओ अपनी दवाइयाँ

कोइ शक नहीं इसमें कि
सच्चे सपूत हो तुम इस देश के
हमने अपनी आँखों से देखा है
परदेस आकर पिछले दिनों  

बेझिझक चले आओ
घर में सब कुशल मंगल है.


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर - 452018  


गड़बड़ सपना

कविता
गड़बड़ सपना
ब्रजेश कानूनगो

1

सपने में सुबह-सुबह ही हुई गड़बड़  
देखा जब मैंने अपना हिन्दी अखबार 
मुखपृष्ठ पर रोमन में छपा था उसका नया नाम

इस ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के भीतर तो बहुत ही गड़बड़ दिखाई दिया
सम्पादकीय की जगह फ्रेंच में छपी थी ‘मन की बात’
किन्ही रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद के ट्वीटर के ठीक नीचे
चर्चित युवा विचारक नें हिन्दी की चिंता में
देवनागरी लिपि में कुछ विलायती सुझाव अंगरेजी में व्यक्त किए थे.

2

सफ़ेद इमारत की पृष्ठभूमि में एक परेड होती दिखाई दी सपने में  
कंधे पर लेपटॉप लटकाए सैनिक बहुत कुशलता से कदम आगे बढ़ाते रहे
तिरंगी टोपियों में शिक्षकों का बहुत बड़ा जत्था
अपने कौशल का प्रदर्शन करता गुजर गया सामने से
अतिथि और मेजबान ने बदल लीं आपस में
अपनी कुर्सियाँ.

3

यह बहुत अजीब था
कि टीवी धारावाहिक की तरह
कई एपिसोडों में बटा हुआ था सपना

कई बन्दूकधारी स्कूलों को घेरे खड़े थे
और अन्दर से बच्चों के रोने की लयबद्ध आवाज आ रही थी
कहा नहीं जा सकता वे कोई पहाड़ा याद कर रहे थे
या किसी मन्त्र का पारायण

पैंसिलों की नोकों पर भीष्म की तरह लेटा रक्त रंजित चित्रकार
बिखेर रहा था रहस्यमयी मुस्कान
दुनिया भर की कूंचियाँ जमा थीं
स्याही और रंगों की जैसे बाढ़ उमड़ी थी वहाँ

मुम्बई के किसी फ्रेंच रेस्टोरेंट में घुसे आतंकवादियों ने 
ब्रिटेन के नागरिकों को बंदी बना लिया था
पाकिस्तान की जेल में बंद किसी साथी को मुक्त करवाना चाहते थे वे
ट्विन टावर को ध्वस्त करने के बाद नाव में बदल गया विमान

गालियों की तरह नारे बोलते हुए कुछ युवक प्रबुद्ध बुजुर्गों की सभा में चले आए सपने में  
पेरिस में मोमबत्तियाँ जलाए मूर्ती की पास जमा हुए क्षोभ में डूबे नागरिक

और सबसे बड़ी गड़बडी तो यह हुई
कि रात तीन बजकर पैंतालीस मिनट पर
मोबाइल की चिड़िया बोल उठी

शान्ति समिति का एसएमएस था-
विश्व शान्ति और भाई-चारे पर विमर्श के लिए बैठक रखी गयी है
दोपहर एक बजे गांधी हाल में.


ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इंदौर – 452018

          
   



Thursday, December 1, 2016

दूरियाँ


कविता
दूरियाँ
ब्रजेश कानूनगो

1
बहुत दूर थे..
इतने दूर कि
मोबाइल से बात कर रहे थे
एक पलंग के दो छोर पर थे दोनों !

2
एक छींक आती है उनको स्क्रीन पर 
तो हम बीमार हो जाते हैं 
इतने करीब हैं वे
जैसे लेपटॉप पर कैमरे की आँख.

3
शाम की सैर के बाद
आरामकुर्सी पर सुस्ताएंगे अभी आकर  
दाल बघारने की वही अद्भुत खुशबू
फिर बिखर जाएगी थोड़ी देर में
चौथाई सदी की दूरी के बावजूद
साथ-साथ हैं वे अभी-तक. 


ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018